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मनुष्यता (मैथिलीशरण गुप्त)

CBSE Class 10 Hindi (Course B) • Sparsh Part-2 • Poetry (Kavya Khand)

कवि: मैथिलीशरण गुप्त (Maithili Sharan Gupt)

'राष्ट्रकवि' (National Poet) मैथिलीशरण गुप्त द्विवेदी युग के बहुत बड़े कवि थे। उनकी कविताओं में देशभक्ति (Patriotism), राष्ट्र-प्रेम, आपसी भाईचारा (Brotherhood) और 'मानवता' (Humanity) का संदेश बहुत गहराई से मिलता है। उनकी सबसे प्रसिद्ध रचना 'भारत-भारती' ने आज़ादी की लड़ाई में लोगों में बड़ा जोश भर दिया था। इस कविता 'मनुष्यता' में उन्होंने स्वार्थ (Selfishness) को छोड़कर दूसरों के लिए जीने और मरने वाले को ही 'असली इंसान' (सच्चा मनुष्य) माना है।

कविता का मूल भाव (Theme/Core Message):

यह कविता हमें सिखाती है कि केवल अपने लिए जीना 'पशु-प्रवृत्ति' (Animal Instinct) है। असली मनुष्य वह है जो दूसरों के दुःख को अपना समझे, स्वार्थ त्यागकर परोपकार (Charity) करे, और जरूरत पड़ने पर मानवता (Humanity) की रक्षा के लिए अपनी जान देने से भी न डरे। कवि ने दधीचि, कर्ण, रंतिदेव और उशीनर जैसे अनेक महान दानवीरों का उदाहरण देकर परोपकार की महिमा गाई है। और बताया है कि "वही मनुष्य है कि जो मनुष्य के लिए मरे।"

पद 1: मृत्यु से मत डरो (सच्ची मनुष्यता)

विचार लो कि मर्त्य हो न मृत्यु से डरो कभी,
मरो परंतु यों मरो कि याद जो करें सभी।
हुई न यों सुमृत्यु तो वृथा मरे, वृथा जिए,
मरा नहीं वहीं कि जो जिया न आपके लिए。
वही पशु-प्रवृत्ति है कि आप आप ही चरे,
वही मनुष्य है कि जो मनुष्य के लिए मरे॥

शब्दार्थ: मर्त्य = मरणशील (Mortal), सुमृत्यु = अच्छी मौत (Glorious death), वृथा = बेकार (Waste), पशु-प्रवृत्ति = जानवरों का स्वभाव (Animal instinct), आप आप ही चरे = सिर्फ अपने लिए जीना।

भावार्थ: कवि कहते हैं कि हे इंसान! यह अच्छी तरह विचार (सोच) कर लो कि हमारा शरीर मरणशील (Mortal) है, सबको एक न एक दिन मरना है; इसलिए कभी भी मौत से मत डरो। किंतु तुम इस प्रकार मरो कि उस मौत को एक 'सुमृत्यु' (गौरवशाली मृत्यु/Glorious Death) कहा जाए, जिससे तुम्हारे मरने के बाद भी पूरी दुनिया तुम्हें याद रखे (जैसे महापुरुषों को याद किया जाता है)। यदि तुम्हारी मृत्यु ऐसी 'सुमृत्यु' नहीं हुई तो तुम्हारा इस धरती पर जीना और मरना दोनों व्यर्थ (Waste) हैं।
कवि कहते हैं कि जो इंसान केवल 'अपने काम' और 'अपने सुख' के लिए जीता और खाता है (आप आप ही चरता है), वह तो एक जानवर (पशु) की तरह है। सच्चा मनुष्य वही है, जो दूसरे मनुष्यों के काम आए और उनके लिए अपने प्राण दे दे।

पद 2: परोपकारी अमर हो जाते हैं

उसी उदार की कथा सरस्वती बखानती,
उसी उदार से धरा कृतार्थ भाव मानती।
उसी उदार की सदा सजीव कीर्ति कूजती,
तथा उसी उदार को समस्त सृष्टि पूजती。
अखंड आत्मभाव जो असीम विश्व में भरे,
वही मनुष्य है कि जो मनुष्य के लिए मरे॥

शब्दार्थ: उदार = महान/दानी (Generous), बखानती = वर्णन करती है (Praise), कृतार्थ = धन्य (Blessed), सजीव कीर्ति = अमर यश (Immortal Fame), अखंड आत्मभाव = अपनत्व की भावना (Brotherhood)।

भावार्थ: कवि कहते हैं कि जो मनुष्य उदार (Generous/Kind) और परोपकारी होता है, माँ सरस्वती (किताबें और इतिहास) हमेशा उसकी कथा की महानता को गाती है (बखानती है)। यह पूरी धरती (धरा) उस दानी व्यक्ति का अहसान मानती है (कृतार्थ होती है) और उसे अपने लिए धन्य मानती है। ऐसे उदार व्यक्ति की हमेशा जीवित रहने वाली कीर्ति या यश (Fame) चारों दिशाओं में गूँजती है। पूरी सृष्टि (दुनिया) उसे पूजती (सम्मान देती) है।
सच्चा इंसान वह है जो इस पूरी दुनिया में 'भाईचारे' (अखंड आत्मभाव) का संदेश फैलाए, और दूसरों की रक्षा करते हुए अपने प्राण त्याग दे।

पद 3: महापुरुषों के दान के उदाहरण

क्षुधार्त रन्तिदेव ने दिया करस्थ थाल भी,
तथा दधीचि ने दिया परार्थ अस्थिजाल भी।
उशीनर क्षितीश ने स्वमांस दान भी किया,
सहर्ष वीर कर्ण ने शरीर-चर्म भी दिया。
अनित्य देह के लिए अनादी जीव क्या डरे?
वही मनुष्य है कि जो मनुष्य के लिए मरे॥

शब्दार्थ: क्षुधार्त = भूख से तड़पता (Starving), करस्थ = हाथ का, अस्थिजाल = हड्डियों का ढाँचा (Bones), उशीनर क्षितीश = राजा शिवि (King Shibi), स्वमांस = अपना मांस (own flesh), शरीर-चर्म = शरीर का कवच (Armor)।

भावार्थ: कवि ने इस पद में कुछ महान दानी (Charitable) पुरुषों को याद किया है:
1. राजा रन्तिदेव: वे 40 दिनों से भूख (क्षुधा) से तड़प रहे थे, जब उन्हें खाने की थाली मिली तो एक भीखारी आ गया और उन्होंने अपने 'हाथ की थाली' (करस्थ थाल) भी उस भूखे को दे दी।
2. महर्षि दधीचि: देवताओं को 'वृत्रासुर' (राक्षस) से बचाने के लिए और वज्र (Weapon) बनाने के लिए उन्होंने अपनी हड्डियों (अस्थिजाल) का दान दे दिया।
3. राजा उशीनर (शिवि): एक कबूतर की जान बचाने के लिए उन्होंने अपना ही मांस (स्वमांस) काटकर बाज (पक्षी) को दे दिया था।
4. वीर कर्ण: उन्होंने देवताओं की रक्षा के लिए ख़ुशी-ख़ुशी अपने शरीर से जुड़ा कवच और कुंडल (शरीर-चर्म) काटकर दान दे दिया।
कवि कहते हैं कि जब आत्मा अमर है, तो फिर इस मिट्टी के (नष्ट होने वाले/अनित्य) शरीर के लिए मनुष्य (जीव) क्यों डरता है? उसे भी बिना डरे इंसानियत के काम आना चाहिए।

पद 4: सहानुभूति ही सबसे बड़ी पूँजी है

सहानुभूति चाहिए, महाविभूति है यही;
वशीकृता सदैव है बनी हुई स्वयं मही।
विरुद्धवाद बुद्ध का दया-प्रवाह में बहा,
विनीत लोक-वर्ग क्या न सामने झुका रहा?
अहा! वही उदार है परोपकार जो करे,
वही मनुष्य है कि जो मनुष्य के लिए मरे॥

शब्दार्थ: सहानुभूति = दया/करुणा (Sympathy/Compassion), महाविभूति = सबसे बड़ा खज़ाना (Greatest Wealth), मही = पृथ्वी (Earth), विरुद्धवाद = जो परम्परा के खिलाफ था (Opposition), परोपकार = भलाई (Charity)।

भावार्थ: कवि कहते हैं कि मनुष्य के अंदर सबसे बड़ा गुण 'सहानुभूति' (दया और करुणा) का होना चाहिए, यही मन की सबसे बड़ी संपत्ति (विभूति) है। पूरी पृथ्वी (मही) भी हमेशा ऐसे दयालु लोगों के आगे वश में (वशीकृता) या झुकी हुई रहती है।
उदाहरण (भगवान बुद्ध): महात्मा बुद्ध ने करुणा (Compassion) और दया के प्रवाह में आकर उस समय की पुरानी मान्यताओं और बुराइयों (यज्ञों में पशुबलि आदि) का विरोध (विरुद्धवाद) किया था। शुरुआत में लोगों ने बुद्ध का विरोध किया, लेकिन बाद में उनकी 'दया और करुणा' के कारण पूरी दुनिया (विनीत लोक-वर्ग) उनके सामने सम्मान से झुक गई। सबसे बड़ा उदार व्यक्ति वही है जो निस्वार्थ परोपकार करता है।

पद 5: अहंकार से दूर रहें

रहो न भूल के कभी मदांध तुच्छ वित्त में,
सनाथ जान आपको करो न गर्व चित्त में।
अनाथ कौन है यहाँ? त्रिलोकनाथ साथ हैं,
दयालु दीनबंधु के बड़े विशाल हाथ हैं。
अतीव भाग्यहीन है अधীর भाव जो भरे,
वही मनुष्य है कि जो मनुष्य के लिए मरे॥

शब्दार्थ: मदांध = घमंड में अंधा (Blind in Pride), वित्त = धन-दौलत (Wealth), सनाथ = जिसके पास सब हो (Safe), अनाथ = बेसहारा (Orphan), त्रिलोकनाथ = ईश्वर, अधीर = व्याकुल (Impatient)।

भावार्थ: कवि चेतावनी देते हैं कि कभी भी 'थोड़े से धन या दौलत' (तुच्छ वित्त) को पाकर अहंकार में अंधे (मदांध) मत बनो। यह मत सोचो कि तुम 'सनाथ' (Wealthy/Powerful) हो और तुम्हारे पास सब कुछ है, ऐसा गर्व (घमंड) मन में मत रखो।
कवि समझाते हैं कि इस पूरी दुनिया में 'अनाथ' (बेसहारा) कोई भी नहीं है!
क्योंकि तीनों लोकों के स्वामी (ईश्वर/त्रिलोकनाथ) हमेशा सबके साथ हैं। परमेश्वर (दीनबंधु) अत्यंत दयालु हैं और उनके हाथ विशाल (Huge) हैं—वे सबको सहारा देते हैं। इसलिए वह मनुष्य बहुत 'भाग्यहीन' (Unlucky) और पागल है, जो अपने मन में व्याकुलता (Insecurity/Impatience) भरता है कि उसका क्या होगा। जो सच्चा मनुष्य है, वह डर और अहंकार छोड़कर मानवता के लिए मरता है।

पद 6: असीम विश्व में भाईचारे के साथ आगे बढ़ें

अनंत अंतरिक्ष में अनंत देव हैं खड़े,
समक्ष ही स्वबाहु जो बढ़ा रहे बड़े-बड़े।
परस्परावलंब से उठो तथा बढ़ो सभी,
अभी अमर्त्य-अंक में अपंक हो चढ़ो सभी。
रहो न यों कि एक से न काम और का सरे,
वही मनुष्य है कि जो मनुष्य के लिए मरे॥

शब्दार्थ: अंतरिक्ष = आकाश, स्वबाहु = अपनी भुजाएँ (Arms), परस्परावलंब = एक दूसरे का सहारा (Mutual support), अमर्त्य-अंक = देवताओं की गोद (God's lap), अपंक = बिना किसी कलंक या पाप के (Pure)।

भावार्थ: कवि कहते हैं कि इस विशाल अंतरिक्ष (आकाश) में अनगिनत देवता खड़े हुए हैं, जो अपनी बाहें (स्वबाहु) फैलाकर 'सच्चे और परोपकारी मनुष्यों' का स्वागत करने के लिए इंतज़ार कर रहे हैं।
इसलिए हे मनुष्यो! एक दूसरे का सहारा (परस्परावलंब) बनकर जीवन में उठो और आगे बढ़ो (अकेले मत चलो)। तुम सब ऐसे पवित्र और पाप-मुक्त (अपंक) बन जाओ कि सीधे मृत्यु के बाद देवताओं की गोद (अमर्त्य-अंक) में चढ़ जाओ।
कभी ऐसा जीवन (व्यर्थ) मत जियो कि एक इंसान दूसरे इंसान की मदद (काम) ही न कर सके। स्वार्थ की जिंदगी व्यर्थ है।

BOARD EXAM QUESTIONS

प्रश्न 1: कवि ने 'पशु-प्रवृत्ति' और 'सच्ची मनुष्यता' में क्या अंतर स्पष्ट किया है?

उत्तर: 'मनुष्यता' कविता के अनुसार:
1. पशु-प्रवृत्ति (पशुओं का स्वभाव): जिस प्रकार एक जानवर (पशु) जंगल में सिर्फ अपना पेट भरता है और उसे दूसरों की कोई चिंता नहीं होती है, वैसे ही जो मनुष्य सिर्फ 'अपने स्वार्थ के लिए जीता और खाता है', कवि के अनुसार उसकी प्रवृत्ति पशुओं के समान है।
2. सच्ची मनुष्यता: सच्चा इंसान (मनुष्य) वह है जो अपने स्वार्थ को त्याग दे और अपनी जान की बाजी लगाकर भी दूसरों के दुखों और परेशानियों को दूर करे। 'वह मनुष्य है जो मनुष्य के लिए मरे'—अर्थात जो पूरी दुनिया की भलाई (परोपकार) के लिए अपना जीवन समर्पित कर दे।


प्रश्न 2: कवि ने दधीचि, कर्ण और शिवि (उशीनर) के उदाहरण क्यों दिए हैं?

उत्तर: कवि ने इन महान चरित्रों के उदाहरण समाज में परोपकार, महा-दान और त्याग (Sacrifice) की भावना जगाने के लिए दिए हैं।
- महर्षि दधीचि ने पूरी मनुष्यता (मानव और देवताओं) की रक्षा के लिए अपनी हड्डियों (अस्थिजाल) का दान दे दिया था।
- राजा शिवि ने एक छोटे से कबूतर (पक्षी) की जान बचाने के लिए अपने शरीर का मांस काटकर बाज को खिला दिया था।
- वीर कर्ण ने देवताओं की रक्षा के लिए अपने शरीर से जुड़ा कवच और कुंडल दे दिया था।
इन उदाहरणों से कवि यह सिद्ध करना चाहते हैं कि महापुरुषों ने दूसरों की भलाई के लिए कभी अपने नश्वर शरीर (Mortal body) का मोह (लगाव) नहीं किया, और वे अपने त्याग से अमर हो गए।


प्रश्न 3: "अनाथ कौन है यहाँ? त्रिलोकनाथ साथ हैं" - इस पंक्ति का आशय क्या है और कवि ने इसे किसके संदर्भ में कहा है?

उत्तर: इस पंक्ति का आशय यह है कि इस दुनिया में कोई भी व्यक्ति बेसहारा (Orphan/अनाथ) नहीं है।
कवि ने यह बात उन अहंकारी लोगों को समझाने के लिए कही है जो थोड़े से धन (पैसे/Finance) के नशे में अंधे हो जाते हैं और खुद को 'सनाथ' (बहुत शक्तिशाली/Safe) मानते हुए ग़रीबों को अनाथ (कमज़ोर) समझने लगते हैं।
कवि समझाते हैं कि गर्व (घमंड) करना व्यर्थ है, क्योंकि असली शक्ति भगवान (त्रिलोकनाथ) हैं। उनके विशाल हाथ सबका सहारा बनते हैं, इसलिए मनुष्य को अपने पैसे या ताक़त पर 'घमंड' नहीं करना चाहिए और हर व्यक्ति को 'दयालु' बनना चाहिए।


प्रश्न 4: कवि ने 'महाविभूति' (सबसे बड़ी संपत्ति) किसे कहा है और क्यों? भगवान बुद्ध का उदाहरण देकर स्पष्ट करें।

उत्तर: कवि ने दूसरों के प्रति 'दया, करुणा और सहानुभूति' (Sympathy and Compassion) को जीवन की 'महाविभूति' (सबसे बड़ी पूँजी या संपत्ति) कहा है।
कवि ने भगवान बुद्ध का उदाहरण देते हुए कहा है कि बुद्ध ने लोगों के दुःख को देखकर पुरानी रूढ़ियों (पशु-बलि) और मान्यताओं का कड़ा विरोध (विरुद्धवाद) किया था। शुरुआत में लोग उनके खिलाफ थे, लेकिन उनकी 'सहानुभूति' और 'परोपकार' को देखकर जो समाज कल तक उनका विरोध करता था, वही 'विनीत' (नम्र) होकर उनके चरणों में झुक गया। इसलिए सहानुभूति ही दुनिया की सबसे बड़ी शक्ति है।